نان آور خانه ای هستم،
که نان خورهایش رفته اند
و نان می خورند به نرخ روز
هر یک در جایی
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در عمق بیست هزار فرسنگ
زیر دریا
یک مصرع شعر ، لای خزه ها
پیچ و تاب می خورد
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از خانه
پناه می برم به خیابان
از خیابان به
خانه
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به پشت که نگریستم...دشنه ای بود و لبخندی
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فراوانند بی خوابانی چون من...هر یک در کنج خلوت خویش
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دوستانم می رنجانندم مدام...از دشمنان چیزی در خاطرم نیست
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ارتباطات....اختیاری ، انزوا سرنوشت
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امروز را در خانه می مانم
و در به روی کس نمی گشایم ،
اما بی در و پیکر است خانه ی ذهنم...
می آیند و می روند ،
دوستان نا موافق...آشنایان ناسازگار
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بگذار بگذریم
از شادی ، از اندوه
بگذار بگذریم
از قهر و آشتی
بگذار بگذریم
از سخنان بیهوده و سخت
از عاشقانه های میان تهی
بگذار بگذریم
از اینکه نظر خودتون رو مرقوم میفرمایید سپاسگزارم
نظرات شما عزیزان:
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